राजनीति और विकास
यह तस्वीर अपने आप में कुछ बयां करती है। आज देश चुनाव के दौर से गुजर रहा है। हिमाचल प्रदेश के चुनाव हो चुके हैं और गुजरात के लिए चुनाव प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। दोनों राज्यों में कांग्रेस और बीजेपी आमने सामने हैं। जहां गुजरात में बीजेपी विकास के नाम पर फिर से सत्ता में आने का मार्ग ढूंढ रही है, वह हिमाचल में हाल ही में हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी विकास के दुहाई देकर चुनाव लड़ी।
यह एक सर्वविदित बात है की चुनावों के समय कोई भी राजनीतिक पार्टी हो वह विकास की ही बात करती है- यह तो अपने कार्यकाल के विकास की बात करती है या विपक्ष में होने पर वह आने वाले चुनावों में जीत के बाद जनता के विकास के दावे करती है। लेकिन क्या सचमुच क्या सचमुच राजनीतिक दल सत्ता में आने पर विकास करती हैं ?
अब एक बार फिर से ऊपर वाली तस्वीर पर नजर डालते हैं और उसके शीर्षक पर गौर करते हैं । यही है विकास की असली तस्वीर। चुनाव कोई भी जीते कोई भी हारे इन का विकास नहीं होता। आप इन चुनावी राज्यों - हिमाचल या गुजरात की शहरों में चले जाइए - शहरों के कुछ आगे या पीछे यह बीच में ही किसी छोटे दरिया के किनारे खुले स्थान पर झुग्गी झोपड़ी में पलते हुए बच्चे , आपको इन सरकारों के विकास के दावों की सच्चाई बयां करते नजर आएंगे । गांवों के विकास की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं है। गुजरात और हिमाचल ही क्यों, आप देश के किसी भी हिस्से में चले जाइए ,अाप देश की किसी भी ट्रेन में सफर कर रहे हो, छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुढ़े तक गरीब व्यक्ति दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते हुए आप को दिख जाएंगे। भारत के करोड़ों लोग अभी भी ठिठुरती सर्दी में खुले आसमान के नीचे फुटपाथों पर जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। फिर इनके लिए चुनाव राजनीति और विकास क्या महत्व रखते हैं?
इसके विपरीत , यदि हम चुनावों में खड़े प्रत्याशियों द्वारा घोषित सम्पति का विश्लेषण करें तो हम पाएंगें कि पिछले चुनावों की तुलना में इनकी सम्पति कई गुणा बढ़ चुकी होती है। यहां तक की पहली बार चुनाव लड़ने वाले , और अपने आप को फकीर प्रत्याशी बताने वाले राजनीतिज्ञ भी एक बार चुनाव जीतने के बाद कुछ ही सालों में फलफूल जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि 'राजनीति और विकास' उनके आस-पास ही केंद्रित हो जाता है।
हमारे कहने का अभिप्राय यह नहीं है कि सत्ताधारी राजनीतिक दल विकास नहीं करते हैं । विकास होता है - नयी सड़कें बनती हैं, स्कूल कॉलेज खुलते हैं। विकास की नई नई योजनाओं की घोषणाएं होती हैं विकास के लिए धन भी जारी होता है- और विकास शुरू हो जाता है - चहेते ठेकेदारों का, ग्राम प्रधानों का , बोर्ड अध्यक्षों का, और अन्य ऐसे लोग, जो किसी न किसी प्रकार से सत्ताधारी दल से जुड़े होते हैं। एक अनुमान के अनुसार विकास के लिए जारी होने वाली राशि का लगभग 50% पैसा ही विकास के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बाकी का 50% इन बिचौलियों के विकास में निकल जाता है। घोर गरीबों को इन विकास की योजनाओं का कोई फायदा नहीं हो पाता। यही कारण है के चुनाव दर चुनाव राजनीतिक प्रतिनिधि अमीर से अमीर होते जाते हैं , और आम आदमी जिसे विकास का सपना दिखा कर उनसे वोट लिया जाता है, वहीं का वहीं रह जाता है। और अगले चुनाव में फिर से विकास की उम्मीद लिए हुए, वह राजनीतिक दलों की रैलियों में अपना दिन खपाने के लिए पहुंच जाता है । फिर वही विकास के नारे- फिर वही जिंदाबाद जिंदाबाद के नारे- फिर वही चुनाव - फिर वही विकास की उम्मीद - यही राजनीति है। विकास की राजनीति।
यह तस्वीर अपने आप में कुछ बयां करती है। आज देश चुनाव के दौर से गुजर रहा है। हिमाचल प्रदेश के चुनाव हो चुके हैं और गुजरात के लिए चुनाव प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। दोनों राज्यों में कांग्रेस और बीजेपी आमने सामने हैं। जहां गुजरात में बीजेपी विकास के नाम पर फिर से सत्ता में आने का मार्ग ढूंढ रही है, वह हिमाचल में हाल ही में हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी विकास के दुहाई देकर चुनाव लड़ी।
यह एक सर्वविदित बात है की चुनावों के समय कोई भी राजनीतिक पार्टी हो वह विकास की ही बात करती है- यह तो अपने कार्यकाल के विकास की बात करती है या विपक्ष में होने पर वह आने वाले चुनावों में जीत के बाद जनता के विकास के दावे करती है। लेकिन क्या सचमुच क्या सचमुच राजनीतिक दल सत्ता में आने पर विकास करती हैं ?
अब एक बार फिर से ऊपर वाली तस्वीर पर नजर डालते हैं और उसके शीर्षक पर गौर करते हैं । यही है विकास की असली तस्वीर। चुनाव कोई भी जीते कोई भी हारे इन का विकास नहीं होता। आप इन चुनावी राज्यों - हिमाचल या गुजरात की शहरों में चले जाइए - शहरों के कुछ आगे या पीछे यह बीच में ही किसी छोटे दरिया के किनारे खुले स्थान पर झुग्गी झोपड़ी में पलते हुए बच्चे , आपको इन सरकारों के विकास के दावों की सच्चाई बयां करते नजर आएंगे । गांवों के विकास की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं है। गुजरात और हिमाचल ही क्यों, आप देश के किसी भी हिस्से में चले जाइए ,अाप देश की किसी भी ट्रेन में सफर कर रहे हो, छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुढ़े तक गरीब व्यक्ति दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते हुए आप को दिख जाएंगे। भारत के करोड़ों लोग अभी भी ठिठुरती सर्दी में खुले आसमान के नीचे फुटपाथों पर जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं। फिर इनके लिए चुनाव राजनीति और विकास क्या महत्व रखते हैं?
इसके विपरीत , यदि हम चुनावों में खड़े प्रत्याशियों द्वारा घोषित सम्पति का विश्लेषण करें तो हम पाएंगें कि पिछले चुनावों की तुलना में इनकी सम्पति कई गुणा बढ़ चुकी होती है। यहां तक की पहली बार चुनाव लड़ने वाले , और अपने आप को फकीर प्रत्याशी बताने वाले राजनीतिज्ञ भी एक बार चुनाव जीतने के बाद कुछ ही सालों में फलफूल जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि 'राजनीति और विकास' उनके आस-पास ही केंद्रित हो जाता है।
हमारे कहने का अभिप्राय यह नहीं है कि सत्ताधारी राजनीतिक दल विकास नहीं करते हैं । विकास होता है - नयी सड़कें बनती हैं, स्कूल कॉलेज खुलते हैं। विकास की नई नई योजनाओं की घोषणाएं होती हैं विकास के लिए धन भी जारी होता है- और विकास शुरू हो जाता है - चहेते ठेकेदारों का, ग्राम प्रधानों का , बोर्ड अध्यक्षों का, और अन्य ऐसे लोग, जो किसी न किसी प्रकार से सत्ताधारी दल से जुड़े होते हैं। एक अनुमान के अनुसार विकास के लिए जारी होने वाली राशि का लगभग 50% पैसा ही विकास के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बाकी का 50% इन बिचौलियों के विकास में निकल जाता है। घोर गरीबों को इन विकास की योजनाओं का कोई फायदा नहीं हो पाता। यही कारण है के चुनाव दर चुनाव राजनीतिक प्रतिनिधि अमीर से अमीर होते जाते हैं , और आम आदमी जिसे विकास का सपना दिखा कर उनसे वोट लिया जाता है, वहीं का वहीं रह जाता है। और अगले चुनाव में फिर से विकास की उम्मीद लिए हुए, वह राजनीतिक दलों की रैलियों में अपना दिन खपाने के लिए पहुंच जाता है । फिर वही विकास के नारे- फिर वही जिंदाबाद जिंदाबाद के नारे- फिर वही चुनाव - फिर वही विकास की उम्मीद - यही राजनीति है। विकास की राजनीति।

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